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असम: असमिया मुसलमानों की गिनती के पीछे भाजपा का क्या मक़सद है?

असम में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार 'इंडिजिनस' यानी स्वदेशी मुसलमानों की संख्या का पता लगाने के लिए घर-घर जाकर सर्वेक्षण करने की योजना बनाने जा रही है.

मंगलवार को असम सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रंजीत दत्ता ने स्वदेशी मुसलमान कहे जाने वाले गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह जैसे मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक कर राज्य में सर्वेक्षण करवाने की योजना तैयार करने की बात कही.

इस बैठक के बाद मीडिया के समक्ष मंत्री रंजीत दत्ता ने कहा, "स्वदेशी मुसलमानों के प्रतिनिधियों ने बैठक में जो सुझाव दिए हैं, हमने उसे स्वीकार किया है. सरकार के गृह, राजस्व और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा प्रदेश के स्वदेशी मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक जनगणना घर-घर जाकर आयोजित की जाएगी."

2011 की जनगणना के अनुसार असम की कुल आबादी लगभग तीन करोड़ 12 लाख है और इसमें एक करोड़ से अधिक मुसलमान है.

असम के इन 34.22 फ़ीसदी मुसलमानों में लगभग 42 लाख स्वदेशी मुसलमान बताए जाते है.

मंत्री दत्ता ने बैठक में शामिल हुए संगठनों की एक आपत्ति पर कहा, "स्वदेशी मुसलमानों की जनगणना के बाद जो विकास कॉर्पोरेशन बनाए जाएंगे. उनके नाम के आगे इंडिजिनस और मुसलमान शब्द इस्तेमाल न करने का फ़ैसला लिया गया है. यह एक संवेदनशील सर्वेक्षण होगा क्योंकि ये आशंका है कि बांग्लादेशी मुसलमान अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं. यह मुसलमानों को विभाजित करने के लिए नहीं है बल्कि हम अपने पिछले बजट में किया गया वादा पूरा कर रहे हैं.

देश में एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर उत्पन्न माहौल में ख़ासकर यहां बांग्लाभाषी मुसलमान सत्तारूढ़ भाजपा सरकार की इस योजना पर सवाल उठा रहें हैं.

ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के मुख्य सलाहकार अजीजुर रहमान ने बीबीसी से कहा, "भाजपा असम के मुसलमानों के बीच विभाजन पैदा करके अपनी आगे की राजनीति चमकाना चाहती है. इसलिए स्वदेशी मुसलमानों की अलग से जनगणना करने की योजना बना रही है. भाजपा ने बीते चार साल के शासन में अल्पसंख्यक लोगों के विकास के नाम पर कोई काम नहीं किया."

वो कहते हैं, "अगर मौजूदा सरकार सबका साथ सबका विकास वाली उनकी तथाकथित नीति पर सही तरीक़े से काम करती तो आज स्वदेशी मुसलमान और बाक़ी के मुसलमानों के बीच अंतर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. लोगों को रोज़गार, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए. लेकिन भाजपा सांप्रदायिकता और विभाजन की नीति पर काम करते हुए लोगों के बीच अशांति पैदा करना चाहती है."

वहीं गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय का कहना है कि अल्पसंख्यकों के नाम पर उनकी हर क्षेत्र में भागीदारी का फ़ायदा बंगाली मूल के मुसलमान उठा ले जाते हैं.

अजीजुर रहमान इस बारे में कहते हैं, "अगर ऐसा होता तो फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्ट्रपति नहीं बन पाते. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद बंगाली मुसलमान नहीं थे. फिर भी वो जनिया और बरपेटा जैसे बंगाली बोलने वाले मुसलमान संसदीय क्षेत्रों से विधायक और सांसद बने. अनवरा तैमूर भी बंगाली मूल की मुसलमान नहीं थीं और वो असम की मुख्यमंत्री बनीं. ऐसे बहुत सारे विधायकों के भी उदाहरण है."

रहमान कहते हैं कि इंडिजिनस मुसलमान के नाम पर कुछ संगठन के लोग इस तरह का झूठ फैलाकर सरकार से अपना फ़ायदा उठाने में लगे है.

उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय का विकास हो लेकिन इस विकास के नाम पर विभाजन वाली राजनीति नहीं होनी चाहिए."

सदो असोम गोरिया-मोरिया-देसी जाति परिषद के अध्यक्ष हफ़ीज़ुल अहमद की राय इससे अलग है.

वो कहते हैं, "जब बात अल्पसंख्यकों की होती है तो उसमें इस्लाम को मानने वाले सभी लोगों को शामिल कर लिया जाता है लेकिन असम में पहले हम चार स्वदेशी मुसलमान समुदायों की संख्या ही ज़्यादा थी. बाद में बंगाली मूल के मुसलमानों के यहां आ जाने से हमारी संख्या काफ़ी कम हो गई, जबकि पूर्वी बंगाल से यहां आए मुसलमानों से हमारी भाषा, संस्कृति, पहनावा बिलकुल अलग है.''

अहमद कहते हैं, "अब हम गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय के लोग अलपसंख्यकों के अंदर अल्पसंख्यक बन गए हैं. जितना पुराना हमारा इतिहास है उस हिसाब से विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ. क्योंकि राजनीति समेत कई क्षेत्रों में हमारी भागीदारी कम होने के कारण अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर सरकारी योजनाओं का फ़ायदा बंगाली मूल के मुसलमान उठा ले जाते हैं. उनकी संख्या भी ज़्यादा है और राजनीतिक हिस्सेदारी भी."

क्या स्वदेशी मुसलमानों की पहचान के लिए सर्वेक्षण करने और विकास निगम बनाने से यह सारी समस्याएं ख़त्म हो जाएगी?

इस सवाल के जवाब में हफ़ीजुल अहमद कहते हैं, "हमने सरकार के समक्ष ख़ासतौर पर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय के विकास के लिए निगम बनाने का प्रस्ताव रखा है. लेकिन उससे पहले उन तमाम स्वदेशी मुसलमान लोगों की पहचान करना ज़रूरी है जिनके विकास के लिए निगम बनाया जाएगा. ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे कई मुसलमानों के पास स्वदेशी मुसलमान होने के फ़र्जी सर्टिफिकेट हैं. ऐसे लोगों की पहचान ज़रूरी है."

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